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“चाँदनी चौक की अधूरी मोहब्बत” (पूर्ण कहानी)

  “चाँदनी चौक की अधूरी मोहब्बत” (पूर्ण कहानी) सन 1890… पुरानी दिल्ली। शाम ढल रही थी। सूरज की आख़िरी किरणें लाल किलों की दीवारों से टकराकर जैसे शहर को सुनहरा बना रही थीं। चाँदनी चौक की गलियों में हलचल थी—कहीं मसालों की खुशबू, कहीं इत्र की महक, कहीं चूड़ियों की खनक। लेकिन उसी रौनक के बीच एक छोटी-सी दुकान थी… जहाँ खामोशी रहती थी। उस दुकान पर एक बोर्ड टंगा था— “यहाँ खत लिखे जाते हैं…” और उस दुकान में बैठा था — आरिफ़ । आरिफ़ — अल्फ़ाज़ का मुसाफ़िर आरिफ़ कोई आम इंसान नहीं था। वो लोगों के दिलों की आवाज़ लिखता था। कोई अपनी मोहब्बत का इज़हार करवाने आता, कोई अपने ग़म को शब्द देना चाहता, कोई दूर बैठे अपने घरवालों को यादें भेजता। और हर बार… आरिफ़ बस सुनता… और लिखता। उसकी लिखावट में कुछ ऐसा था कि लोग पढ़ते-पढ़ते रो पड़ते थे। कई लोग कहते थे — “तुम खत नहीं लिखते, दिल लिख देते हो…” लेकिन अजीब बात ये थी… जिसके पास इतने जज़्बात थे, उसके अपने हिस्से में कोई कहानी नहीं थी। एक दिन… वो आई एक शाम, जब हल्की ठंडी हवा चल रही थी… दुकान पर एक परछाई रुकी। आरिफ़ ने सिर उठाया। उसने द...

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